September 23, 2026

मोबाइल और हमारे बच्चे: डराएं नहीं, हर परिवार तय करे ‘एक निश्चित घंटा’

रिपोर्ट-इकरार हुसैन

काशीपुर 22 सितंबर 2026।समाजसेवी श्रीमती उर्वशी दत्त वाली ने कहा है कि आज के डिजिटल युग में बच्चों में मोबाइल की बढ़ती लत एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। इस ज्वलंत विषय पर समाज सेविका व डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने ‘नियमित स्क्रीन समय, सुरक्षित बचपन’ की एक प्रभावी व व्यावहारिक पहल की वकालत की है। उनका स्पष्ट मानना है कि तकनीक से बच्चों को पूरी तरह काटना संभव नहीं है क्योंकि यह आज के दौर की ज़रूरत है, लेकिन इसे सही parenting और पारिवारिक अनुशासन से संतुलित करना अनिवार्य है। पिछले 22 वर्षों से एक कामकाजी महिला के रूप में सक्रिय, समाज सेविका व डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा कि कोविड काल में ऑनलाइन क्लास के दौरान ही उन्होंने अपनी बेटी को पहली बार मोबाइल दिया था, और कहां था हमने जिंदगी में जो बनना था बन गए हैं, हमारे मोबाइल टाइम से आपका कोई मतलब नहीं है,, लेकिन आपका यह टाइम सिर्फ पढ़ाई और खेल का है, आपको सिर्फ यही दो चीज 18 साल तक बहुत अच्छे से अनुशासन में रहकर करनी है, ओर तभी से घर के शेड्यूल अनुसार, गेम या फ्रेंड्स से बात के लिए,रात 9:00 से 10:00 बजे का समय तय कर दिया गया था। ओर यह नियम आज वो 16 वर्ष  की होने वाली है, और आज भी वही नियम जारी है और 10 बजते ही वह खुद फोन रख देती है। उर्वशी बाली का कहना है कि हर, परिवार के सोने और उठने की दिनचर्या अलग होती है, इसलिए माता-पिता को  अपने ही अनुरूप, बच्चों  का दिन का कोई भी ‘एक घंटा’ मोबाइल के लिए तय करना चाहिए। आज बच्चों को गेम खेलने और दोस्तों से बातचीत करने की ज़रूरत होती है, इसलिए जब उन्हें पता होगा कि यह उनका तय समय है, तो वे दिनभर मोबाइल के लिए ज़िद नहीं करेंगे और न ही परिवार में कलह होगी, कि सारा दिन फोन बच्चों के हाथ में रहता है। उर्वशी दत्त बाली ने परवरिश में मां की भूमिका पर विशेष ज़ोर दिया है। उन्होंने कहा कि अनुशासन की डोर हमेशा माता-पिता के हाथ में होनी चाहिए, विशेष रूप से मां के हाथ में। माताओं को अपनी ज़िम्मेदारी से बचते हुए यह नहीं कहना चाहिए कि ‘पापा आएंगे तब बताऊंगी’। बच्चे पर मां का स्वाभाविक प्रभाव और अनुशासन होना आवश्यक है ताकि बच्चा सही दिशा में रहे। हाल ही में हल्द्वानी में मोबाइल छुड़ाने के नाम पर बच्चे की आंखों पर पट्टी बांधकर नकली खून दिखाने वाले प्रकरण की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए समाज सेविका व डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि बच्चे कोमल फूलों की तरह होते हैं। उन्हें इस तरह डराना उनकी mental health पर गहरा आघात पहुंचाता है, जिससे बच्चों और माता-पिता के बीच दूरियां बढ़ती हैं। मनोविज्ञान के अनुसार, लगातार स्क्रीन से बच्चे का cognitive development प्रभावित होता है और मस्तिष्क के अन्य सेल्स निष्क्रिय होने लगते हैं। इसलिए डर की जगह समझदारी और discipline से काम लेना होगा।
उर्वशी दत्त बाली ने सभी अभिभावकों से अपील की कि हर घर में screen time का एक निश्चित घंटा तय कर healthy boundaries बनाएं। इससे बच्चों में digital addiction रुकेगा, माता-पिता की स्वाभाविक निगरानी बनी रहेगी और बच्चों का मानसिक व बौद्धिक आधार सुरक्षित रहेगा। हर स्कूल में भी इस चीज को लागू करना चाहिए कि बच्चों को इस चीज के लिए बोले, और जितना इस चीज समझाएंगे तो सभी बच्चों की समझ में आएगा कि मोबाइल का एक घंटा ही सबके लिए सीमित है।